24 News Update उदयपुर: पारस हेल्थ, उदयपुर ने गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल मरीजों को सटीक और बेहतर इलाज़ देने के लिए एंडोस्कोपिक अल्ट्रासाउंड (EUS) का उपयोग शुरू कर दिया है। एंडोस्कोपिक अल्ट्रासाउंड (EUS) एक आधुनिक तकनीक है जो बीमारियों का जल्दी पता लगाने और पेट व पाचन से जुड़ी जटिल समस्याओं का कम चीर-फाड़ वाली सर्जरी के साथ इलाज करने में मदद करती है। गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. वत्स गुप्ता के नेतृत्व में यह तकनीक डॉक्टरों को बीमारियों का ज्यादा सटीक रूप से पता लगाने और उनका इलाज करने में मदद करती है। यह तकनीक विशेष रूप से उन बीमारियों का पता जल्दी लगाने में मददगार है जिनका पता सामान्य स्कैन से लगाना मुश्किल होता है।
एंडोस्कोपिक अल्ट्रासाउंड (EUS) एक सरल और कम चीर-फाड़ वाली प्रक्रिया होती है। इसमें पाचन तंत्र और आस-पास के अंगों जैसे कि अग्न्याशय, लीवर, पित्त नलिकाएं और लिम्फ नोड्स की साफ़ तस्वीरें लेने के लिए कैमरे और अल्ट्रासाउंड से लैस एक पतली नली का इस्तेमाल किया जाता है। यह डॉक्टरों को समस्याओं का जल्द पता लगाने और इलाज के बेहतर फ़ैसले लेने में मदद करता है, खासकर तब जब सामान्य स्कैन से पर्याप्त जानकारी नहीं मिल पाती है।
इस टेक्नोलॉजी के चिकित्सीय महत्व पर ज़ोर देते हुए पारस हेल्थ, उदयपुर के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. वत्स गुप्ता ने कहा, “EUS टेक्नोलॉजी गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल देखभाल में एक महत्वपूर्ण प्रगति है, क्योंकि यह हमें पैंक्रियाटिक कैंसर, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्यूमर और सिस्टिक घावों जैसी बीमारियों का शुरुआती स्टेज़ में ही पता लगाने में मदद करती है। शुरुआती डायग्नोसिस, इलाज के नतीजों और जीवित रहने की दर को बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभाता है। इसके अलावा EUS-निर्देशित प्रक्रियाओं की मदद से हम लक्षित और कम से कम चीर-फाड़ वाले इलाज कर पाते हैं, जिससे मरीज़ को होने वाली तकलीफ़ कम होती है और ठीक होने में लगने वाला समय भी कम हो जाता है।”
भारत के कुछ हिस्सों में गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल कैंसर का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है, वहाँ शुरुआती और सटीक जाँच की ज़रूरत खास तौर पर महत्वपूर्ण है। ‘इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ फ़ॉरेंसिक एंड कम्युनिटी मेडिसिन’ में छपे अध्ययनों के मुताबिक पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्सों में गैस्ट्रिक और इसोफ़ेजियल कैंसर की घटना दर 100,000 पुरुषों में 21.7 तक पाई गई है। यह आंकड़ा इस बात पर ज़ोर देता है कि शुरुआती पहचान में मदद करने वाले आधुनिक जाँच उपकरणों का होना कितना ज़रूरी है।
EUS का एक सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह ‘फ़ाइन नीडल एस्पिरेशन’ (FNA) कर सकता है। यह एक टारगेटेड और कम चीर-फाड़ वाली तकनीक है, जिसका इस्तेमाल सटीक जाँच के लिए ऊतकों के नमूने इकट्ठा करने में किया जाता है। कई केसों में इससे बड़ी सर्जरी की ज़रूरत कम हो जाती है और ज़्यादा सटीक व हर मरीज़ के हिसाब से इलाज की योजना बनाने में मदद मिलती है।
पारस हेल्थ, उदयपुर में EUS का इस्तेमाल न केवल बीमारी का पता लगाने के लिए, बल्कि कई तरह के इलाज के तरीकों के लिए भी किया जा रहा है। इनमें पैंक्रियास की सिस्ट और फोड़ों से पानी निकालना, पित्त नली में रुकावट का इलाज करना, और कुछ खास तरह के ट्यूमर का टारगेटेड इलाज करना शामिल है। इन कम चीर-फाड़ वाले तरीकों से आमतौर पर मरीज़ों को हॉस्पिटल में कम समय बिताना पड़ता है, वे जल्दी ठीक होते हैं, और उन पर इलाज का कुल बोझ भी कम हो जाता है।
इलाज़ में हुई इन प्रगतियों के बारे में मरीज केंद्रित दृष्टिकोण पर जोर देते हुए डॉक्टर गुप्ता ने कहा, “हमारा लक्ष्य हमेशा मरीज की सुरक्षा, आराम और सटीकता पर रहता है। EUS टेक्नोलॉजी से हम बहुत ही सटीक डायग्नोसिस बहुत ही कम असुविधा के साथ प्रदान करने में सक्षम होते है। इससे मरीज का अनुभव बेहतर होता है और इलाज का परिणाम भी अच्छा होता है।”
एंडोस्कोपिक अल्ट्रासाउंड की शुरुआत पारस हेल्थ, उदयपुर के इस निरंतर प्रयास को दर्शाती है कि वह एडवांस्ड गैस्ट्रोएंटरोलॉजी सेवाओं का विस्तार कर रहा है और इस क्षेत्र के मरीज़ों तक विशेष डायग्नोस्टिक और चिकित्सीय प्रक्रियाओं को और ज्यादा सुलभ बना रहा है।
जिन मरीज़ों को लगातार पेट दर्द, बिना किसी वजह के वज़न कम होना, निगलने में दिक्कत, पीलिया या पाचन से जुड़ी लगातार समस्याएँ हो रही हों, उन्हें समय पर डॉक्टर से सलाह लेने की सलाह दी जाती है, क्योंकि बीमारी का जल्दी पता चलना प्रभावी इलाज के परिणामों को प्रदान करने में अहम भूमिका निभाता है।

