रिपोर्ट—जयवंत भैरविया
24 News Update उदयपुर। पुलिस थानों में लगाए गए सीसीटीवी कैमरों का उद्देश्य क्या है—यह सवाल आज फिर गंभीर बहस के केंद्र में है। आम धारणा भले यह हो कि कैमरे सुरक्षा के लिए लगाए जाते हैं, लेकिन विधिक दृष्टि से यह तथ्य स्थापित है कि पुलिस थानों में सीसीटीवी लगाने का मूल उद्देश्य मानवाधिकारों की रक्षा और हिरासत में पारदर्शिता सुनिश्चित करना है। यह बात माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह सैनी प्रकरण में स्पष्ट रूप से कही जा चुकी है, जिसके बाद देशभर के थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाने के निर्देश दिए गए।
असंभव जैसा हो गया है सूचना प्राप्त करना
इसके बावजूद उदयपुर के पुलिस थानों में सीसीटीवी फुटेज प्राप्त करना आज भी आम नागरिक के लिए लगभग असंभव बना हुआ है। जब भी कोई नागरिक सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत थाने के सीसीटीवी फुटेज की मांग करता है, तो उसे गोपनीयता, तकनीकी कारणों और पूर्वनिर्धारित बहानों के जरिए टाल दिया जाता है। कुछ मामलों में जब आवेदक राज्य सूचना आयोग तक पहुंचे, तो आयोग द्वारा फुटेज देने के आदेश भी जारी हुए, फिर भी जमीनी स्तर पर स्थिति जस की तस बनी रही।
यह उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट, राज्य सूचना आयोग और स्टेट क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (SCRB) द्वारा समय-समय पर पुलिस थानों के सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध कराने को लेकर स्पष्ट और बाध्यकारी निर्देश जारी किए गए हैं। बावजूद इसके, उदयपुर पुलिस द्वारा कई बार इन आदेशों को या तो नज़रअंदाज़ किया गया या रिकॉर्ड में होने से ही इनकार कर दिया गया।
कोर्ट के आदेश नहीं दिख रहे जमीन पर
स्थिति की गंभीरता तब और बढ़ जाती है जब राजस्थान हिरासत में मौतों और सीसीटीवी कैमरे बंद पाए जाने के मामलों में देश में शीर्ष स्थान पर रहा। इस पर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका दर्ज की, जो वर्तमान में विचाराधीन है। इसके आलोक में कई नए दिशा-निर्देश जारी किए गए, लेकिन जमीनी हकीकत में कोई ठोस परिवर्तन दिखाई नहीं देता। उदयपुर का भूपालपुरा थाना इस संदर्भ में विशेष रूप से चर्चा में है, जहां पूर्व में भी मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़े आरोप सामने आते रहे हैं। चाहे चालान के नाम पर कथित मारपीट हो या अन्य विवाद—हर बार सीसीटीवी कैमरे बंद होने का ही हवाला दिया गया। जानकारी के अनुसार, इस थाने में महीनों तक कैमरे बंद रहे।
डिजिटल अथवा प्रिंट डिस्प्ले के रूप में प्रदर्शित किए जाएं
सुप्रीम कोर्ट में चल रहे प्रकरण के मद्देनज़र SCRB ने हाल ही में पुनः स्पष्ट निर्देश जारी किए कि “नागरिक अधिकारों के संरक्षण के लिए आवश्यक होने पर नागरिक नियमानुसार थाने से दस्तावेज या सीसीटीवी फुटेज प्राप्त कर सकते हैं,”
और यह निर्देश थानों के स्वागत कक्ष में डिजिटल अथवा प्रिंट डिस्प्ले के रूप में प्रदर्शित किए जाएं।
इसके बावजूद जब भूपालपुरा थाने से सीसीटीवी फुटेज सूचना के अधिकार के तहत मांगा गया, तो थानाधिकारी द्वारा एक ऐसा उत्तर दिया गया, जो RTI कानून की आत्मा के विपरीत प्रतीत होता है। उत्तर में आवेदक से यह अपेक्षा की गई कि वह यह स्पष्ट करे कि सूचना किस लोकहित या जनहित में मांगी जा रही है, किस प्रकरण से संबंधित है और यह भी प्रमाणित करे कि संबंधित तिथि व समय पर उसके साथ कोई घटना हुई थी या नहीं।
यहीं से गंभीर विधिक प्रश्न खड़े होते हैं— क्या सूचना मांगने वाले को अब आरटीआई आवेदन के साथ लोकहित पर निबंध लिखना होगा? क्या आवेदक को पहले घटना सिद्ध करनी होगी, तब जाकर सूचना देने पर विचार किया जाएगा? और क्या थानाधिकारी को यह तय करने का अधिकार है कि सूचना में जनहित है या नहीं? सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 6(2) स्पष्ट कहती है कि आवेदक से सूचना मांगने का कोई कारण नहीं पूछा जा सकता। वहीं धारा 19(5) यह भार लोक सूचना अधिकारी पर डालती है कि वह यह साबित करे कि सूचना देने से इनकार क्यों उचित था—न कि आवेदक पर।
कानूनी स्थिति यह भी है कि आरटीआई आवेदन पर निर्णय लेने का अधिकार केवल नामित लोक सूचना अधिकारी (PIO) को होता है, न कि थानाधिकारी को। ऐसे में थाने स्तर पर सूचना रोकना न केवल प्रशासनिक निर्देशों का उल्लंघन है, बल्कि RTI कानून की खुली अवहेलना भी है।
कैसे होगी मानवाधिकारों की रक्षा
प्रश्न यह नहीं है कि सीसीटीवी फुटेज दी जाए या नहीं, प्रश्न यह है कि क्या कानून से ऊपर कोई व्यवस्था खड़ी की जा रही है?
यदि पुलिस थानों के सीसीटीवी फुटेज पर ही ताले लगे रहेंगे, तो आम नागरिक के मानवाधिकारों की रक्षा कैसे होगी, न्याय व्यवस्था पर भरोसा कैसे बनेगा और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का सम्मान कैसे सुनिश्चित किया जाएगा?
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