ये कहानी गरीबी, मजबूरी और मायूसी के बीच वक्त के सितम की है। ये कहानी अपनों के बिछड़ जाने के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूटने की हैं। ये कहानी जिंदगी के घोर अंधेरों में उम्मीद की किरण बनकर आए शिक्षकों की है। मदद को आगे आए उन लोगों की है जिनके दम पर इंसानियत जिंदा है। यहां बात हो रही है सलूंबर जिले के जयसमंद पंचायत समिति की गामड़ी ग्राम पंचायत के इस गरीब परिवार की। यहां के परतावत फला में बीते डेढ़ साल में इन बच्चों के परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। माता पिता की बीमारी से मौत हो गई। उसके बाद पांच छोटे-छोटे मासूम बच्चे बेसहारा हो गए। माता पिता की मौत के बाद पांचों भाई बहिन केलुपोश मकान में रहकर अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं। आपको बता दें कि गामड़ी परतावत फला निवासी पांचा मीणा की पत्नी पदु मीणा की करीब डेढ़ वर्ष पहले बीमारी के चलते मौत हो गई। उसके बाद बच्चों के पिता पांचा मीणा भी चल बसे। माता पिता की मौत के बाद पुत्री रंजना, ललिता, पुत्र संतोष, पुत्री मनीषा और पुत्र पवन मीणा बेसहारा हो गए। माता पिता की मौत के बाद गरीबी के चलते दोनों बड़ी बहनों रंजना और ललिता को पढ़ाई से नाता तोड़ने को मजबूर होना पड़ा। मनीषा और पवन का भी विद्यालय में प्रवेश नहीं हो सका। ये बच्चे अपने माता-पिता के जीवनकाल में भी लगातार गरीबी से जूझ रहे थे। पांचों के पिता के बड़े भाई नुर्जन मीणा की भी माली हालात खराब है व उसके भी संतानें अधिक होने से वे इन बच्चों की परवरिश का खर्चा उठाने सक्षम नहीं है। फिलहाल पांचों भाई बहिन के भोजन के लिए सरपंच प्रतिनिधि कालूलाल मीणा ने अपने स्तर पर राशन सामग्री भेजी। कई बार घर में चूल्हा नहीं जल पाता तो पांचों भाई बहिन भोजन अपने बड़े पापा के यहां करने को मजबूर हैं। इस बीच लगातार अनुपस्थित रहने पर राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय गामड़ी की शिक्षिका करिश्मा मीणा संतोष के घर गई। बच्चों ने अपनी दास्तान सुनाई तो उनका मन द्रवित हो गया। स्कूल के शिक्षकों ने अपने स्तर पर संतोष के लिए बैग, कॉपी, स्कूल ड्रेस की सिलाई की व्यवस्था की। संतोष को फिर स्कूल से जोड़ा। 13 वर्षीय रंजना मीणा अब अपने चारों भाई बहिनों की जिम्मेदारी उठाने में सक्षम नहीं है। इन्हें मदद की दरकार है। सरपंच भूरी मीणा का कहना है कि पांचों भाई बहिनों के आधार कार्ड बनवाने का जिम्मा उन्होंने उठाया हैं इसके अलावा इनके माता-पिता मृत्यू प्रमाण पत्र जारी करवाए हैं। इन बच्चों का भविष्य क्या होगा, हम नहीं जानते मगर मदद के लिए आगे आकर इनका वर्तमान सुधारने में मदद जरूरी कर सकते हैं।
मां-बाप नहीं रहे, गरीबी के बोझ तले 13 वर्षीय बहन कर रही चार भाई बहनों का भरण पोषण

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