24 न्यूज अपडेट. नई दिल्ली। शराब नीति से जुड़े सीबीआई के एक केस में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को आज सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई। केजरीवाल 177 दिन बाद जेल से बाहर आएंगे। अदालत ने जमानत के लिए वहीं शर्तें लगाई हैं, जो म्क् केस में बेल देते वक्त लगाई गई थीं। केजरीवाल के खिलाफ ईडी व सीबीआई ने केस किया था। ईडी मामले में सुप्रीम कोर्ट से 12 जुलाई को जमानत मिल गई थी। शराब नीति केस में एन्फोर्समेंट डायरेक्टोरेट ने उन्हें 21 मार्च को अरेस्ट किया था। 26 जून को उन्हें जेल से हिरासत में भेज दिया गया था। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जवल भुईयां की बेंच ने गिरफ्तारी को नियमों के तहत बताया। कहा कि जमानत मिलने के बावजूद केजरीवाल को जेल में रखना न्याय का मजाक उड़ाना होगा। गिरफ्तारी की ताकत का इस्तेमाल बहुत सोच समझकर किया जाना चाहिए।जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति पहले से हिरासत में है। जांच के सिलसिले में उसे दोबारा अरेस्ट करना गलत नहीं है। याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी अवैध नहीं है। नियमों का कोई उल्लंघन नहीं किया है। जस्टिस उज्जवल भुईयां ने कहा कि गिरफ्तारी जवाब से ज्यादा सवाल खड़े करती है। जैसे ही ईडी केस में उन्हें जमानत मिलती है। सीबीआई एक्टिव हो जाती है। ऐसे में अरेस्टिंग के समय पर सवाल खड़े होते हैं। निष्पक्ष दिखना चाहिए और हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए ताकि गिरफ्तारी में मनमानी न हो। जांच एजेंसी को पिंजरे में बंद तोते की धारणा को दूर करना चाहिए।साथ ही, दोनों जज केजरीवाल को जमानत देने के फैसले पर एकमत थे, क्योंकि इस मामले में आरोपपत्र दाखिल हो चुका है और निकट भविष्य में मुकदमा पूरा होने की संभावना नहीं है। ईडी मामले में अंतरिम जमानत देते समय समन्वय पीठ द्वारा लगाई गई शर्तें इस मामले में भी लागू होंगी। इसका मतलब यह होगा कि केजरीवाल मुख्यमंत्री के कार्यालय और दिल्ली सचिवालय नहीं जा सकते और आधिकारिक फाइलों पर हस्ताक्षर नहीं कर सकते, जब तक कि दिल्ली के उपराज्यपाल की मंजूरी/अनुमोदन प्राप्त करने के लिए ऐसा करना आवश्यक और आवश्यक न हो।न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा, “मैं यह समझ पाने में असफल हूं कि सीबीआई ने अपीलकर्ता को उस समय गिरफ्तार करने में इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई, जब वह ईडी मामले में रिहाई के कगार पर था…अपीलकर्ता की विलंब से की गई गिरफ्तारी अनुचित थी।“जब केजरीवाल को मनी लॉन्ड्रिंग मामले में प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) के तहत कड़ी शर्तों के बावजूद जमानत मिल गई है, तो संबंधित अपराध (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत सीबीआई केस) में उनकी आगे की हिरासत असहनीय हो गई है। जस्टिस भुयान ने कहा कि इन आधारों पर अपीलकर्ता को हिरासत में रखना न्याय का मजाक है, खासकर तब जब उन्हें पीएमएलए के एक अधिक कड़े मामले में जमानत दी गई है।न्यायमूर्ति भुयान ने जमानत की शर्त पर भी आपत्ति जताई कि केजरीवाल को मुख्यमंत्री कार्यालय या सचिवालय नहीं जाना चाहिए। हालांकि, उन्होंने न्यायिक अनुशासन और समन्वय पीठ द्वारा पारित निर्देश के प्रति सम्मान को ध्यान में रखते हुए इस संबंध में कोई निर्देश पारित नहीं करने का फैसला किया।न्यायमूर्ति भुइयां ने सीबीआई को यह सुनिश्चित करने के उसके कर्तव्य की भी याद दिलाई कि उसकी जांच निष्पक्ष हो।“सीबीआई एक प्रमुख जांच एजेंसी है। यह जनहित में है कि सीबीआई न केवल ईमानदार हो बल्कि ऐसा दिखना भी चाहिए। हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए ताकि यह धारणा दूर हो कि जांच निष्पक्ष रूप से नहीं की गई है और गिरफ्तारी पक्षपातपूर्ण तरीके से की गई है। कानून के शासन द्वारा संचालित एक कार्यशील लोकतंत्र में धारणा मायने रखती है। सीज़र की पत्नी की तरह, एक जांच एजेंसी को ईमानदार होना चाहिए। कुछ समय पहले ही इस न्यायालय ने सीबीआई की आलोचना करते हुए इसकी तुलना पिंजरे में बंद तोते से की थी। यह जरूरी है कि सीबीआई पिंजरे में बंद तोते की धारणा को दूर करे, बल्कि यह धारणा खुले तोते की होनी चाहिए Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading... Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Post navigation कॉमरेड सीताराम येचुरी को श्रद्धांजलि सरकार ने पोर्ट ब्लेयर का नाम श्री विजयपुरम किया:शाह बोले- यह गुलामी के प्रतीकों से मुक्ति