24 न्यूज अपडेट उदयपुर। उदयपुर के मैग्नस हॉस्पिटल में उपचार में गंभीर लापरवाही से वकील साहब के बच्चे के अंधे हो जाने और डिस्चार्ज दस्तावेजों में अस्पताल की ओर से तथ्यात्मक छेड़छाड़ के मामले में अधिवक्ता योगेश जोशी की याचिका पर अब जाकर सुखेर थाने में एफआईआर दर्ज की गई है। यह एफआईआर डॉ. शिल्पा गोयल (स्त्री रोग विशेषज्ञ मैग्न्स हॉस्पीटल) और डॉ. मनोज अग्रवाल (शिशु रोग विशेषज्ञ, मैग्नस हॉस्पीटल) के खिलाफ धारा 175 (3) भा ना सु सं. अपराध अन्तर्गत धारा 201, 338, 418, 468, 471, 120-बी भारतीय दण्ड संहिता के तहत दर्ज की गई है। यह मामला चिकित्सा पेशे में हद से ज्यादा लापरवाही, दस्तावेजों में छेड़छाड़, उसके बाद पूरे सिस्टम का धनाढ्य लोगों के पक्ष में लामबंद हो जाना, थाना स्तर पर किसी उपरी दबाव के कारण अब तक जांच तक नहीं करवाना व अपना नाकारापन साबित कर सिस्टम से लोगों का विश्वास उठाना, कलेक्टर स्तर पर जांच के बावजूद अब तक न्याय नहीं मिल पाना। दोषियों पर सीएमएचओ स्तर पर पहले अति सक्रियता दिखाना, फिर नोटिस तक नहीं देना और परिवादी को हर स्तर पर दबाव बना कर मामला वापस लेने के लिए प्रेशराज करने से जुड़ा हुआ है। इसको पढ़कर कोई भी सहज अंदाजा लगा सकता है कि न्याया मिलना तो दूर की बात है किसी मामले की जांच तक करवा उसको अंजाम तक पहुंचाना इस सड़ांध मारते सिस्टम में लगभग असंभव सा हो गया है। यदि बार एसोसिएशन का लगातार दबाव नहीं होता तो मामला यहां तक भी नहीं पहुंच सकता क्योंकि परिवादी का कहना है कि कोई गोयल साहब हैं जो हर बार किसी को बचाने आ जाते हैं, जिनके प्रभाव से हर स्तर पर परेशानी होती है। इस मामले में अब एफआईआर हो गई है पर मजे की बात है कि पुलिस वही जांच करेगी जो कलेक्टर की बिठाए कमेटी पहले ही कर चुकी है। जांच अधिकारी ने साफ कह दिया है कि वह कलेक्टर की जांच को नहीं मानते। याने हर बार मामले को एबीसीडी से शुरू करो और समय निकालो, यह पुराना आजमाया हुआ पैंतरा यहां भी काम में लिया जा रहा है।
इस मामले में हम एफआईआर का जिक्र करें उससे पहले एक अपडेट यह आई कि मैग्नस अस्पताल की ओर से बताए गए नवीन गोयल और दलाल कमल शर्मा के खिलाफ अभद्र शब्दों के प्रयोग व धमकी का परिवाद मामले के परिवादी वकील साहब योगेश जोशी ने भूपालपुरा थाने में दिया है। उन्होंने बताया कि उनको कदम कदम पर धमकाया जा रहा है। न्याय मिलना तो बहुत दूर की बात है। एक और डिवलपमेंट इस मामले में यह हुआ है कि हाईकोर्ट में स्टे का ऑर्डर मैग्नस अस्पताल के पक्ष में आया था जिसमें यह कहा गया था कि सीएमएचओ की ओर से कानूनी कार्रवाई जारी रखी जा सकती है, हॉस्पिटल को बंद नहीं किया जाएगा। अगर बंद करवाना है तो तीन महीने का नोटिस देना होगा। गौर करने लायक तथ्य है कि सीएमएचओ की ओर से अस्पताल को ऐसा कोई नोटिस दिया गया है इसकी अब तक कोई जानकारी नहीं है। प्राथी योगेश जोशी ने बताया कि कोर्ट ने मामले की आईओ सुखेर थाना, रेणु खोईवाल को परसों आधें घंटे का समय देकर बुलाया लेकिन वे नहीं आई। चार बजे तक इंतजार किया मगर नहीं आई उसके बाद न्यायालय ने नाराजगी जाहिर की व इस्तगासे पर एफआईआर दर्ज करवाने के आदेश दिए।
यह लिखा एफआईआर में
प्रकरण में प्रार्थी व पीड़ित परिवादी वकील योगेश जोशी ने बताया कि 4 अप्रेल को उन्होंने जिला पुलिस अधीक्षक उदयपुर को एक रिपोर्ट पेश कर अभियुक्तगण के विरुद्ध अपराध अन्तगत धारा 201, 338, 418, 468, 471. 120-वी भारतीय दण्ड संहिता पर प्रकरण दर्ज कर कार्यवाही के लिए लिखा। इस पर पुलिस अधीक्षक की ओर से रिपोर्ट को कार्यवाही के लिए पुलिस थाना सुखेर को भेज दिया गया। प्रकरण पर कार्यवाही के लिए निर्देशित किया गया। क्योंकि यह मामला डॉक्टरों की लापरवाही से नवजात शिशु के अन्धे हो जाने के का था इसलिये थानाधिकारी की ओर से इस पर मेडिकल बोर्ड की राय पर ही रिपोर्ट दर्ज किये जाने की बात कहीं गई। लेकिन ध्यान रखने वाली बात ये है कि इस बात को लगभग 4 माह का समय बीत चुका है, परन्तु पुलिस थाना सुखेर द्वारा ना तो मेडिकल बोर्ड का गठन करवाया है. ना ही आगे कोई कार्यवाही की है। यह तथ्य भी उल्लेखनीय है की इसी मामले में जिला कलेक्टर द्वारा भी अलग से अपने स्तर पर जांच प्रारम्भ की थी जिसमें मेडिकल बोर्ड बना कर रिपोर्ट भी ली गई इस मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर जिला कलेक्टर द्वारा दोषियों के खिलाफ कार्यवाही भी प्रारम्भ की गई है लेकिन थानाधिकारी जिला कलेक्टर द्वारा गठित इस मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को मानने को तैयार नहीं हैं व आरोप लगाया कि जान बूझकर मामले में कार्यवाही नहीं करना चाहते है ऐसे में कोर्ट के माध्यम से एफआईआर की मांग की गई। यह तथ्य बहुत ही गंभीर है कि एक मामले में कलेक्टर कमेटी बना कर जांच करवा लेते हैं लेकिन थानाधिकारी किन्हीं जबर्दस्त दबाव के चलते ना तो कमेटी बनाते हैं ना ही कलेक्टर की बनाई कमेटी की कोई परवाह करते है। क्या एक ही मामले को बार-बार कमेटी बना कर कहीं लंबित करने का प्रयास तो नहीं किया जा रहा है।
बहरहाल इस्तगासे में बताया गया कि अभियुक्तगण मैग्नस हॉस्पीटल नामक सस्थान के जरिये अपने मरीजां को चिकित्सा सेवाएँ, जिसमें स्त्री रोग, शिशु रोग व अन्य रोगों की जाँच व उपचार शामिल है उपलब्ध करवाते हैं। इस मैग्नस हॉस्पीटल में अभियुक्त संख्या 2 डॉ शिल्पा गोयल स्त्री रोग सर्जन व चिकित्सक के रूप में कार्यरत है और अभियुक्त संख्या 3 इसी अस्पताल में शिशु एंव बाल रोग के चिकत्सक के रूप में कार्यरत है। परिवादी योगेश शर्मा की पत्नि अपूर्वी जोशी (पवार) गर्भवती थी और डिलेवरी के सम्बंध में अभियुक्त संख्या 2 से चिकित्सकीय परामर्श एव चिकित्सा प्राप्त कर रही थी और नियमित अन्तराल पर अस्पताल में चैकअप के लिए आती थी। तथा अभियुक्त द्वारा दिये जा रहे उपचार के अनुरूप दवाईयों का सेवन कर रही थी। इसी प्रकार नियमित चेकअप के लिए परिवादी अपनी पत्नि को लेकर 19 जुलाई 2023 को मैग्रस अस्पताल में अभियुक्त संख्या 2 के पास ले गया। उस समय परिवादी की पत्नी को 7 माह का गर्भ था और वह स्वस्थ थी केवल मात्र नियमित अन्तराल पर की जाने वाली फॉलोअप जांच के लिये आई थी। चैकअप के दौरान अभियुक्त ने अपने संस्थान मैग्नस हॉस्पीटल की ही मशीनों से परिवादी की पत्नी की सोनोग्राफी / डॉप्लर करवाई। इस जाँच के बाद अभियुक्त संख्या 2 द्वारा परिवादी को यह बताया गया की गर्भ में द्रव की मात्रा काफी कम हो गयी है एमिनियोटिक फ्लूड की मात्रा केवल 3.9 सीएम है जबकि इसकी मात्रा 7 सीएम से अधिक होनी चाहिए इसलिये बच्चे की जान को खतरा है तो तुरन्त ही ऑपरेशन के जरिये डिलेवरी करनी पड़ेगी अन्यथा माँ अथवा बच्चे की जान को खतरा उत्पन्न हो सकता है यह कह कर परिवादी की पत्नि को तुरन्त भर्ती होकर ऑपरेशन करवाने के लिए जान बूझ कर डराते हुए उत्प्रेरित किया।
परिवादी की पत्नी को शारीरिक रूप से कोई परेशानी नहीं हो रही थी इसलिए परिवादी ने एक अन्य निष्पक्ष जाँच केन्द्र से जाँच कराने का निर्णय लिया, और तुरन्त ही एपेक्स चैम्बर मधुबन में स्थित अर्थ डायनोस्टिक पर अपने स्तर पर जाँच करवाई। जाँच के बाद अर्थ की रिपोर्ट में एमिनोटिक फ्ल्यूओइड की मात्रा 8.2 सीएम अकित की गई, जो की नॉर्मल थी। जिससे परिवादी उसके परिजन काफी परेशान हो गये क्योंकि एक ही दिन में 2 घण्टे के अन्तराल पर ही, परस्पर विरोधाभासी दो अलग-अलग रिपोर्ट प्राप्त हुई थी। इस प्रकार दो परस्पर विरोधाभासी रिपोर्ट से परेशान होने के बाद भी अभियुक्त पर विश्वास कायम रखते हुए परिवादी एक बार पुन परामर्श हेतु अभियुक्त के पास आया और उक्त विरोधाभास के बारे में सुचित किया, इस पर अभियुक्त द्वारा उसी समय एक बार फिर से जाँच करवाने के लिए कहा और वही जाँच उसी दिन तीसरी बार फिर से मैग्ग्रस अस्पताल में की गई जिसमें अस्पताल की रिपोर्ट मेंएमिनियोटिक फ्लूड की मात्रा 5.8 सीएम होना बताया गया। इस प्रकार यहाँ पर स्पष्ट हो गया कि एक ही दिन में एक ही जाँच को तीन बार करने पर तीन अलग-अलग विरोधाभासी तीन रिपोर्ट प्राप्त हुई। फिर भी अभियुक्त ने संवेदनशील तरीके से चिकिप्सकीय परामर्श नहीं देते हुए परिवादी को एक बार फिर से डराया और उसे उसी दिन भर्ती होकर अगले दिन सर्जरी के जरीये डिलेवरी कराने के लिए उत्प्रेरित किया।
अभियुक्तगण मैग्ग्रस हॉस्पीटल नामक सस्थान के जरिये अपने मरीजो को चिकित्सा सेवाएँ, जिसमें की स्त्री रोग, शिशु रोग व अन्य रोगों की जाँच व उपचार शामिल है उपलब्ध करवाते है। इस मैग्नस हॉस्पीटल में अभियुक्त संख्या 2 डॉ शिल्पा गोयल स्त्री रोग सर्जन व चिकित्सक के रूप में कार्यरत है और अभियुक्त संख्या 3 इसी अस्पताल में शिशु एंव बाल रोग के चिकित्सक के रूप में कार्यरत है। परिवादी की पत्नि अपूर्वी जोशी (पवार) गर्भवती थी और अपने गर्भाधान व डिलेवरी के सम्बंध में अभियुक्त संख्या 2 से चिकित्सकीय परामर्श एव चिकित्सा प्राप्त कर रही थी और नियमित अन्तराल पर अस्पताल में चैकअप के लिए आती थी तथा अभियुक्त द्वारा दिये जा रहे उपचार के अनुरूप दवाईयों का सेवन कर रही थी। इसी प्रकार नियमित चेकअप के लिए परिवादी अपनी पत्नी को लेकर 19 जुलाई को मैग्रस अस्पताल में अभियुक्त संख्या 2 के पास लाया। उस समय परिवादी की पत्नी को 7 माह का गर्भ था और वह पूर्णरूप से स्वस्थ थी। केवल मात्र नियमित अन्तराल पर की जाने वाली फॉलोअप जांच के लिये आई थी। चैकअप के दौरान अभियुक्त ने अपने संस्थान मैग्नस हॉस्पीटल की ही मशीनों से परिवादी की पत्रि की सोनोग्राफी/डॉप्लर करवाई। इस जांच के बाद अभियुक्त संख्या 2 द्वारा परिवादी को बताया गया कि गर्भ में द्रव की मात्रा काफी कम हो गयी है। एमिनियोटिक फ्लूड की मात्रा केवल 3.9 सीएम है जबकि इसकी मात्रा 7 सीएम से अधिक होनी चाहिए इसलिये बच्चे की जान को खतरा है तो तुरन्त ऑपरेशन के जरिये डिलेवरी करनी पड़ेगी अन्यथा मां अथवा बच्चे की जान को खतरा उत्पन्न हो सकता है। यह कह कर परिवादी की पत्नी को तुरन्त भर्ती होकर ऑपरेशन करवाने के लिए जानबूझ कर डराते हुए उत्प्रेरित किया।
परिवादी के पुत्र को अभियुक्त के अस्पताल से 15 अगस्त, 23 को डिस्चार्ज किया गया और उस समय मरीज की छुट्टी पर सारांश डिस्चार्ज समरी के अन्तर्गत उपचार के लिये अकित ट्रीटमेंट ऑफ एडवाइज्ड डिस्चार्ज के तहत केवल मात्र तीन बिन्दुओं का उल्लेख किया था जिसमें तीन प्रकार की दवाएँ शिशु को देना वर्णित किया था और इसके बाद भी शिशु के स्वास्थ्य के सबन्ध में परिवादी की पतनी अभियुक्त संख्या 2 से लगातार व्हाट्सअप के जरिये सम्पर्क में रही, परन्तु ना तो डिस्चार्ज समरी के सलाह वाले कॉलम में और ना ही व्हाट्सअप पर सम्पर्क के दौरान अभियुक्त संख्या 2 के द्वारा या हॉस्पीटल सस्थान द्वारा बच्चे की आरओपी याने रेटिनोपेथी ऑफ प्री मेच्योरिटी कराने की सलाह दी जबकि यह चिकित्सा शास्त्र का सर्वविदित्त तथ्य है कि समयपूर्व जन्म लेने वाले बच्चों के मामले में यह एक अत्यन्त आवश्यक प्रक्रिया है, और इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया जाना गम्भीर चिकित्सकीय असावधानी की परिभाषा में आता है और इससे बच्चा जीवनभर के लिए अधेपन का शिकार हो सकता है। अभियुक्तगण द्वारा घोर असावधानी बरतते हुए इस प्रकार की कोई सलाह परिवादी को नहीं दी गई तथा परिवादी इस तथ्य से अजान होकर आप पर विश्वास करते हुए आश्वस्त था। जब परिवादी का बच्चा लगभग 6 माह का हो गया, उसके बाद ऐसा प्रतीत होने लगा कि उसकी आँखों में रोशनी नहीं तथा वह ठीक से किसी चीज पर आंख को टिका कर नहीं रख पाता है. यह संदेह उत्पन्न होने पर परिवादी एक बार पुनः बच्चे को लेकर अभियुक्त सं 2 के पास आया और इस बारे में बताया तो अभियुक्त को मन ही मन अपनी आपराधिक गलती का अहसास हो गया, पर अभियुक्त ने साजिशन इस तथ्य को छिपाते हुए बच्चे को तुरन्त ही मधुबन उदयपुर स्थित आँखों के अस्पताल एएसजी में ले जाकर आखो के विशेषज्ञ को दिखाने की सलाह दी। परिवादी जब बच्चे को लेकर आँखों के अस्पताल पहुँचा, तब वहां डॉक्टर ने देखकर बताया कि बच्चे की आरओपी नहीं करवाने कि वजह से उसके रेटीना का विकास नहीं हो पाया है, और गम्भीर हालात बताकर बच्चे को तुरन्त ही अखिल भारतीय आर्युविज्ञान संस्थान नई दिल्ली में दिखाने की सलाह दी। जब परिवादी ने अभियुक्त संख्या 2 को यह जानकारी दी कि एम्स नई दिल्ली ले जाने की सलाह दी है तो अभियुक्त संख्या. 2 में बदनियती एवं षडयन्त्रपरिवादी को पुनः अपने पास बुलाया व विश्वास दिलाया कि अखिल भारतीय आर्युविज्ञान संस्थान नई दिल्ली में मेरी जान पहचान है. तथा में वहीं पर अपोईन्टमेन्ट दिलवा दूंगा। आप सारे मूल दत्तावेज लेकर मेरे पास आ जाओ। इस पर परिवादी ने अभियुक्त सं. 2 की बात पर विश्वास करते हुए समस्त मूल दस्तावेज की फाईल अभियुक्त स 2 को सुपुर्द कर दी थी, परन्तु उक्त फाईल की एक फोटोप्रति जिसमें की डिस्वार्ज समरी भी शामिल है, परिवादी के पास अलग से रखी हुई थी। अभियुक्त सं. 2 ने परिवादी से मूल इलाज के सारे कागज लेने के बाद अगले दिन सारे कागज लौटा दिये, और परिवादी को कहा की आप सीधा एम्स दिल्ली की एमरजेन्सी में दिखा देना, अर्थात की अभियुक्त सं. 2 के द्वारा परिवादी को दिल्ली के किसी भी डॉक्टर से कोई अपॉईन्टमेन्ट नहीं दिलवाया गया और केवल मात्र मूल दस्तावेज एक दिन अपने पास रखकर अगले दिन लौटा दिये। अभियुक्त संख्या 2 के इस व्यवहार से परिवादी को बहुत आश्चर्य हुआ लेकिन उस वक्त अपने पुत्र के इलाज की जल्दी में एक बार सारे दस्तावेज लेकर परिवादी दिल्ली का लिये रवाना हो गया. बाद में सावधानी पूर्वक दस्तावेजों की जांच करने पर ज्ञात हुआ कि. अभियुक्त सं 2 द्वारा दस्तावेजों में षड्यन्त्रपूर्वक व साजिशन हेर-फेर करते हुए डिस्चार्ड समरी का एक कागज बदल दिया गया, और सलाह में आरओपी जांच का बिन्दु जोडते हुए 2 अन्य सलाह भी अंकित कर दी गई, साथ-साथ जो इलाज की पर्ची थी, उसमें भी अपने हाथ से आरओपी का अंकन कर दिया गया। अभियुक्त का ये कृत्य न केवल गंभीर आपराधिक कृत्य है बल्कि चिकित्सक के पवित्र व्यवसाय के साथ धोखाधडी भी है. इस प्रकार अभियुक्त द्वारा भारतीय दण्ड संहिता की धारा 201, 338, 418, 420, 468, 471 120-बी के अन्तगत अपराध कारित किया गया है।
परिवादी ने जब अपने पुत्र को ।प्प्डै संस्थान, दिल्ली में दिखाया तो. वहां पर उसकी आखो की गम्भीर हालात देखते हुए एम्स संस्थान के चिकित्सकों द्वारा, परिवादी को बताया गया की इस प्रकार के मामलों में समय बहुत महत्तवपूर्ण तथ्य है तथा समय पर आरओपी नहीं कराये जाने से यह बच्चा अब जिन्दगी भर भर के लिये अन्धा हो चुका. है. यह बताकर ईलाज से इकार कर दिया गया। इसके बाद परिवादी जब बहुत निराश व परेशान था तब किसी परिचित ने हैदराबाद स्थित आँखों के अस्पताल में जाने की सलाह दी जहाँ पर कि अभी वर्तमान में परिवादी के पुत्र के इलाज का प्रयास चल रहा है। परन्तु आज भी आँखों की स्थिति वैसी ही गम्भीर है तथा उसका पुत्र अंधेपन का शिकार हो चुका है।
अभियुक्तगण द्वारा चिकित्सकिय पेशे के पवित्र कर्तव्यों की अवेलना करते हुए धोखाधडी करते हुए छल पूर्वक सदोष हानि कारित की है. और स्वयं के लिये छल पूर्वक अवैध लाभ अर्जित किया है. साथ ही गम्भीर आपराधिक लापरवाही से परिवादी के पुत्र की आँखों की रोशनी छीन ली है. और जिन्दगी भर के लिये अंधेपन का अभिशाप झेलने पर मजबुर किया है. और इसके अलावा धोखाधडी एवं षडयंत्र पूर्वक इलाज के कागजातों में हेर-फेर कर फर्जी दस्तावेज तैयार करने, सबूत मिटाने का अपराध भी किया है. जो कि एक गम्भीर अक्षम्य अपराध है और अभियुक्तगण इसके लिए पूर्णरूप से उत्तरदायी है। अभुक्तिगण का उक्त कृत्य भारतीय दण्ड संहिता की धारा 201 338 418, 420, 468 471 120-वी के अर्न्तगत दण्डनीय अपराध है। प्रार्थी परिवादी के द्वारा पुलिस में रिपोर्ट दिये जाने के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं की गई इसलिये प्रार्थना पत्र पेश है।
इस पर न्यायालय ने सुखेर थाने को मामला दर्ज करने के आदेश दिए हैं।


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By desk 24newsupdate

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