आरटीआई एक्टिविस्ट व वरिष्ठ पत्रकार जयवंत भैरविया की आरटीआई से खुलासा 24 न्यूज अपडेट उदयपुर। आपमें से किसी के घर पर या आस-पड़ोस में कभी सांप जरूर निकला होगा। ऐसा कब और कितनी बार हुआ कि आपने स्नैक केचर को बुलाया हो और उसके साथ में वन विभाग का गश्ती दल आया हो? ऐसा कब हुआ कि वन विभाग के गश्ती दल के सहयोग और निगरानी में सांप पकड़ा गया हो ओर उसे सुरक्षित छोड़ा गया हो। लेकिन वन विभाग यह दावा कर रहा है कि उसके गश्ती दल की देखरेख में स्नैक केचर सांप पकड़ने का काम करते हैं। इसे अलावा आपने यह कब सुना कि वन विभाग की ओर से कोई ऐसा हैल्पलाइन नंबर है जिस पर आप फोन कर दें और तुरंत सांप पकड़ने वाला दल आ जाए? नहीं सुना होगा क्योंकि ऐसा होता नहीं है। मगर वन विभाग कहता है कि प्राइवेट स्नैक केचर के नंबर ही उसके हैल्पलाइन नंबर है। जबकि वह ना तो निजी तौर पर सांप या अन्य वन्यजीव पकड़ने की सेवाएं देने वालों को कोई सरकारी पहचान देता है ना ही कोई वेतन-भत्ते, मानदेय या सुरक्षा। ऐसे में वह कैसे दावा कर सकता है कि स्नैक कैचर उसके लिए सेवाएं दे रहे हैं। जबकि स्नैक केचर अपनी जान पर खेल कर केवल अपने शौक, जुनून और जनसेवा के प्रति समर्पण के भाव से काम कर रहे हैं। इसके अलावा हमारे वन विभाग को यह तक नहीं पता है कि उदयपुर में कितने तरह के जहरीले सांप पाए जाते हैं। उसके पास सर्पदंश से होने वाली मौतों की संख्या भी नहीं है। जबकि वन विभाग हर बार वन्यजीव गणना से पहले बड़ी-बड़ी वर्कशॉप करता है जिसमें वन्यजीवों आदि के बारे में बारीकी से जानकारी दी जाती है। उसके बाद जो आंकड़े आते हैं उनको सहेजने व विश्लेषण का काम भी उसी का है। मेवाड़ के सांपों के बारे में जानकारी अगर वन विभाग के पास नहीं होगी तो किसके पास होगी? कौन बताएगा कि यहां कितने जहरीले सांप हैं और कौन-कौनसी प्रजातियां सामान्य सांपों की है व कौन-कौन सी लुप्तप्रायः हो चुकी है या होने वाली है। आंकड़ों का संग्रहण ही नहीं होगा तो उनका विश्लेषण कैसे होगा, वन्यजीवों के लिए नीतियां कैसे बनेंगी।यह सभी तथ्य सामने आए हैं देश के जाने-माने आरटीआई एक्टिविस्ट और सामाजिक कार्यकर्ता वरिष्ठ पत्रकार जयवंत भैरविया की आरटीआई में। भैरविया ने वन विभाग से आरटीआई में पूछा कि उदयपुर राजस्थान में पाए जाने वाले जहरीले साँपो की सूचना प्रदान की जाए, उदयपुर राजस्थान में घरों में निकलने वाले साँपो को पकड़ने के लिये वन विभाग द्वारा अधिकृत / नियुक्त साँप पकड़ने वाले / स्नैक कैचर के नाम व पते की सूचना प्रदान की जाए, उदयपुर शहर में निकलने वाले साँपों को पकड़ने वाले स्नेक कैचर को वन विभाग द्वारा उपलब्ध करवाई गई सुविधाओं / संसाधनों / सुरक्षा उपकरणों की सूचना प्रदान की जाए, उदयपुर शहर में वन विभाग द्वारा घरों में निकलने वाले सांपों को पकड़ने के लिये बनाए गए हेल्पलाइन नम्बर की सूचना प्रदान की जाए, उदयपुर शहर में पिछले 2 सालों में सर्पदंश से होने वाली मृत्यु की सूचना प्रदान की जाए।एक्टिविस्ट भैरविया की आरटीआई के जवाब में उप वन संरक्षक वन्यजीव ने जो जवाब दिया वो चिंता में डालने वाला है। आरटीआई से पता चला है कि वन विभाग के पास उदयपुर के जहरीले सांपों का कोई रिकॉर्ड ही नहीं है। अब सवाल यह उठता है कि अगर राज्य सरकार कोई सर्पनीति बनाने के लिए आंकड़े मांगेगी या फिर कभी विधानसभा में इस पर कोई सवाल पूछ लिया जाएगा तो क्या होगा? आखिर क्या जवाब दिया जाएगा? किसी भी पारिस्थितिकी तंत्र में वहां पर मौजूद सांपों का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान होता है क्योंकि वे फूडचेन का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है। उसी से पारिस्थितिकी संतुलन भी बना रहता है। सांपों की प्रजातियों के बारे मे ंही जानकारी नहीं है तो यह बहुत बड़ी चिंता का विषय है। राजस्थान सरकार को तुरंत इसका संज्ञान लेकर विभाग को डेटा कलेक्टर करने का आदेश देना चाहिए। जहरीले सांपो ंकी प्रजाति के अनुसार ही स्थानीय स्तर पर एंटीवेनम मुहैया करवाई जाती है। यदि सांपों के बारे में ही नहीं पता है तो उपचार की नीति कैसे बनाई जा सकेगी। जब विभाग से घरों में निकलने वाले सांपों को पकड़ने वाले स्नेक कैचर को वन विभाग द्वारा उपलब्ध करवाई गई सुविधाओं / संसाधनों / सुरक्षा उपकरणों की सूचना मांगी गई तो प्राइवेट स्नैक केचर्स केनाम और मोबाइल नंबर दे दिए गए जो सबके पास पहले से उपलब्ध है। इन सभी नामों और नंबरों का वन विभाग से कोई लेना देना नहीं है, ना ही किसी प्रकार का टाईअप किया गया है। ऐसे में विभाग आखिर कैसे आरटीआई के जवाब में प्राइवेट लोगों का नाम व नंबर दे सकता है। वन विभाग की और से स्नैक केचर्स को ना तनख्वाह मिलती है, ना सुविधा ना सुरक्षा उपकरण मुहैया करवाए जाते हैं। सर्पदंश से हुई मौतों के सवाल पर भी जवाब आया है कि रिकॉर्ड शून्य है। अर्थात उदयपुर में एक भी मौत सर्पदंश से नहीं हुई है या कह सकते है ंकि वन विभाग सर्पदंश से हुई मौतों से अनजान है। यह सूचना बताती है कि विभिन्न सरकारी विभागों में समन्वय की कमी है। वे आपस में डेटा शेयर नहीं करते और ऐसा करने की इच्छाशक्ति भी नहीं रखते। एक्टिविस्ट व पत्रकार जयवंत भैरविया कहते हैं कि समन्वय की कमी व सूचना शून्यता अधिकारियों की लापरवाही का नतीजा है। इसका संज्ञान लेकर सरकार को कड़े कदम उठाने चाहिए। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading... Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Post navigation प्रताप गौरव केन्द्र पर दही हांडी में 51 हजार का पुरस्कार गडिय़ा देवरा के नाम सीसारमा 5 फीट, सांडोल माता एनीकट लबालब, चिकिलवास में मकान ढहने से 7 बच्चों के पिता की मौत